ईरानी युवाओं पर आर्थिक संकट का गहराता साया: महंगाई, प्रतिबंध और भविष्य की अनिश्चितता
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ईरान की युवा पीढ़ी, विशेषकर ज़ी-जेन, वर्तमान में अभूतपूर्व आर्थिक उथल-पुथल का सामना कर रही है। आसमान छूती मुद्रास्फीति, उच्च बेरोज़गारी दरें, और हालिया भू-राजनीतिक घटनाओं तथा अंतर्राष्ट्रीय प्रतिबंधों के कारण उत्पन्न हुई बाधाएँ उनके दैनिक जीवन को गंभीर रूप से प्रभावित कर रही हैं। यह स्थिति केवल एक अस्थायी उतार-चढ़ाव नहीं है, बल्कि एक गहन संरचनात्मक चुनौती का प्रतिबिंब है जो देश के भविष्य की संभावनाओं को आकार दे रही है।
ईरान में कीमतों में दैनिक आधार पर वृद्धि हो रही है, जिसे व्यक्तिगत अनुभवों में 'अकल्पनीय' बताया गया है। हाल ही में इज़राइल के साथ हुए संघर्ष और तेहरान के परमाणु कार्यक्रम पर संयुक्त राष्ट्र द्वारा पुनः लगाए गए प्रतिबंधों के बाद यह संकट और गहरा गया है। संयुक्त राष्ट्र ने ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर रविवार तड़के उसपर फिर से प्रतिबंध लगा दिए, जिसके बाद पहले से ही मुश्किलों से जूझ रहे देश के लोगों की भविष्य को लेकर चिंताएं और बढ़ गई हैं। कई परिवारों के लिए, मांस, मछली और चावल जैसी बुनियादी आवश्यकताओं का उपभोग भी वेतन चक्रों के बीच सीमित करना पड़ रहा है। इस दबाव की गंभीरता इस हद तक है कि कुछ लोग अपने पालतू जानवरों की देखभाल का खर्च न उठा पाने के कारण उन्हें छोड़ने पर विवश हो रहे हैं।
आँकड़े इस संकट की व्यापकता को दर्शाते हैं: आधिकारिक बेरोज़गारी दर 7.6% बताई गई थी, लेकिन युवाओं के बीच यह दर काफी अधिक है। नवीनतम उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, ईरान की समग्र बेरोजगारी दर 2024 की चौथी तिमाही में 7.20 प्रतिशत थी। हालाँकि, शिक्षित युवाओं के लिए बेरोज़गारी की दर और भी अधिक चिंताजनक है, जो पहले 22 प्रतिशत तक पहुँच चुकी थी, जिसका एक कारण प्रतिबंधों और अपर्याप्त निवेश को माना गया है। एक अन्य गंभीर तथ्य यह है कि देश की लगभग 80% आबादी वैश्विक गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन कर रही है, हालाँकि विश्व बैंक के अक्टूबर 2024 के आंकड़ों के अनुसार, 2020 से 2022 के बीच गरीबी दर में कमी आई थी। [cite:7, cite:1] यह स्थिति दर्शाती है कि रोज़गार के अवसर, विशेष रूप से कुशल श्रम के लिए, तेज़ी से सिकुड़ रहे हैं।
युवाओं के व्यक्तिगत दृष्टिकोण इस सामूहिक तनाव को उजागर करते हैं। एल्नाज़ जैसी युवा महिलाएँ केवल मुद्रास्फीति समाप्त होने की कामना करती हैं ताकि वे सामान्य जीवन की ओर लौट सकें और विदेश में रहने वाले अपने रिश्तेदारों से मिलने की स्वतंत्रता पा सकें। बीता के लिए, व्यक्तिगत आकांक्षाएँ अब केवल स्वतंत्रता, समृद्धि और आर्थिक सुधार की बुनियादी इच्छाओं में सिमट गई हैं। वहीं, अमीन जैसे अन्य लोग एक गहरी निराशा व्यक्त करते हैं, जहाँ कुछ लोग विकास की संभावनाओं की कमी के कारण युद्ध या मृत्यु को भी एक पलायन मार्ग के रूप में देखते हैं। यह विभाजन इस बात का संकेत है कि बाहरी दबाव ने आंतरिक सामाजिक ताने-बाने पर गहरा मनोवैज्ञानिक प्रभाव डाला है।
राजनीतिक मोर्चे पर, अमीन का मानना है कि यदि कोई नया संघर्ष छिड़ता है तो शासन ही पूरी तरह से ज़िम्मेदार होगा, और बाहरी खतरों के नाम पर जनता को एकजुट करने की पुरानी रणनीति अब अपनी वैधता खो चुकी है। यह दर्शाता है कि जनता का विश्वास अब बाहरी कारकों पर दोषारोपण करने के बजाय आंतरिक नेतृत्व की जवाबदेही की ओर मुड़ रहा है। आम नागरिक इस बात से भयभीत हैं कि किसी भी नए टकराव का खामियाजा उन्हें ही भुगतना पड़ेगा, जिससे देश के दिवालिया होने का खतरा बढ़ जाएगा। प्रतिबंधों के कारण दवाओं की कमी जैसी गंभीर समस्याएँ भी सामने आई हैं, जिससे कैंसर जैसी बीमारियों के उपचार पर असर पड़ रहा है, जो दर्शाता है कि संकट की परतें कितनी गहरी हैं।
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स्रोतों
Deutsche Welle
Al Jazeera
BBC News
Reuters
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